आख़िर इस शोर में मैं हूँ,
या मुझमें शोर है?
ये कैसा शोर है,
जो मुझे बाँधे रखता है,
जो हर वक़्त रहता है,
जो मुझे खुद से दूर करता है।
क्यों ये शोर मुझे अकेला नहीं छोड़ता,
आख़िर इस शोर में मैं हूँ,
या मुझमें शोर है?
क्यों गुम हूँ मैं इस शोर में,
क्यों भागती हूँ मैं इस शोर से,
और भागकर दूसरे शोर के पीछे छुप जाती हूँ।
क्यों मजबूर हूँ मैं,
बनाए रास्तों पर चलने के लिए?
कैसा पिंजरा है,
जिसका दरवाज़ा खुला है,
पर मैं बाहर नहीं आ पा रही।
कैसा डर है ये,
हर पल कुछ खोने का।
क्यों मेरे ख़याल मुझे सताते हैं?
आख़िर क्यों ये इतना शोर मचाते हैं?
आख़िर मैं इस शोर में हूँ,
या मुझमें शोर है?