पिता वो नहीं, जो छोड़कर चला जाए,
अपना होकर भी जो पराया बन जाए।
पिता वो नहीं, जो घर की दीवारें तो दे,
पर उस घर में रहने का सुकून न दे।
पिता वो है, जो तुम्हें समझे,
तुम्हारी खामोशी के शब्दों को पढ़े।
गलती पर डाँटे, राह भी दिखाए,
गिरने से पहले हाथ बढ़ाए।
दुनिया चाहे तुम्हें कितना सताए,
वो बनकर ढाल तुम्हें बचाए।
पिता होना भाग्य की बात है,
पिता होना जीवन की सौगात है।
हर किसी को पिता मिल जाए—ज़रूरी नहीं,
और हर कोई पिता कहलाए—ज़रूरी नहीं।
पिता केवल दो शब्दों का नाम नहीं,
ये हृदय में लिखा कोई मुकाम नहीं।
पिता वो है जो संभालना जाने,
तुम्हारे टूटने से पहले तुम्हें पहचानने जाने।
तुम हारो तो हौसला बने,
तुम रुको तो रास्ता बने,
तुम चुप रहो तो आवाज़ बने,
तुम डरो तो विश्वास बने।
जिसने पिता को खोया है,
वही उसकी कीमत जानता है।
एक खाली कुर्सी देखकर भी
किसी के होने का अर्थ पहचानता है।
एक पिता का जाना
सिर्फ़ एक इंसान का जाना नहीं,
एक छाँव का उठ जाना है,
एक आवाज़ का थम जाना है,
एक हाथ का छूट जाना है,
और कई बार—
एक बच्चे का अचानक बड़ा हो जाना है।
इसलिए पिता वो नहीं
जो केवल जन्म का कारण हो,
पिता वो है
जो जीवन का सहारा हो।
एक जन्म देना शायद प्रकृति का नियम है,
पर पिता बनना—
एक ज़िम्मेदारी, एक कर्म, एक धर्म है।
और सच तो यही है—
हर पुरुष पिता नहीं होता,
क्योंकि पिता होना
सिर्फ़ जन्म देने से नहीं,
किसी की ज़िंदगी सँवारने से होता है।